Share Market Se Paise Kaise Kamaye

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शेयर मार्केट के कार्य

कंपनियां शेयर्स कैसे जारी करती हैं

सर्वप्रथम कंपनियां अपने शेयर्स की स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग करवाकर IPO (Initial Public Offering) लाती है और अपने शेयर्स स्वंय द्वारा निर्धारित किये हुए मूल्य पर Public को Issue करती हैं। एक बार IPO पूरा हो जाने के बाद Shares, Market में आ जाते हैं और स्टॉक एक्सचेंज और ब्रोकर्स के माध्यम से निवेशकों द्वारा आपस में ख़रीदे और बेचे जाते हैं। तो चलिए जानते है Share Market Se Paise Kaise Kamaye के बारे में

Shares के Prices कैसे बदलते हैं

सर्वप्रथम आईपीओ लाते वक्त शेयर्स के Price कंपनी निर्धारित करती हैं लेकिन एक बार आईपीओ पूरा हो जाने के बाद Shares का मूल्य निर्धारित करने में कंपनी का कोई Role नहीं होता और Shares के मूल्य स्वतन्त्र रूप से Shares की Demand और Supply के आधार पर Stock एक्सचेंज द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। अगर ख़रीदे जाने वाले Shares की तुलना में बेचे जाने वाले Shares की संख्या कम होगी तो Shares के Price बढ़ेंगे और अगर बेचे जाने वाले Shares की तुलना में ख़रीदे जाने वाले Shares की संख्या कम होगी तो Share Price कम होगी।

शेयर मार्केट में रजिस्टर्ड होने के बाद कंपनियों को समय-समय पर सभी महत्वपूर्ण जानकारियां निवेशकों के साथ साझा करनी होती हैं और इसी जानकारियों के आधार पर निवेशक कंपनियों का मूल्यंकन करते हैं। इस मूल्यांकन के आधार पर शेयर्स की Demand और Supply घटने-बढ़ने से Shares के Price Change होते हैं।

इक्विटी शेयर क्या है

इक्विटी शेयर , शेयर का सबसे पोपुलर प्रकार है, आम तौर पर हम जिन शेयर की बात करते है, वो Equity Share ही होते है, लेकिन हम इक्विटी कहने के बजाये सिर्फ शेयर कहते है, Share Market Se Paise Kamaye

जहा पर भी सिर्फ शेयर की बात की जा रही होती है, उसका मतलब होता है कि वहा पर “Equity Share” की ही बात की जा रही है, जब तक कि उन शेयर के पहले कुछ और ना लिखा हो, जैसे- प्रेफेरेंस शेयर, या DVR शेयर ।

दूसरे शब्दों में

इक्विटी शेयर को आर्डिनरी शेयर के नाम से भी जाना जाता है, Equity Share को शोर्ट में सिर्फ शेयर भी कहा जाता है, इसका मतलब है अगर किसी शेयर के आगे पीछे कुछ नहीं लिखा है- सिर्फ शेयर लिखा है तो वो Equity Share माना जाता है।

इसके आलावा इक्विटी शेयर जिनके पास होता है, उन्हें कम्पनी का असली मालिक कहा जाता है, इक्विटी शेयर जिनके पास होता है उन्हें इक्विटी शेयर होल्ल्डर कहा जाता है।

शेयर और डिबेंचर में अंतर

शेयर और डिबेंचर में कुछ मुख्य अंतर हैं-

  • स्टेटस- शेयर किसी कंपनी का कैपिटल होता है किन्तु डिबेंचर किसी कंपनी का डेब्ट (debt) होता है. अतः कोई शेयरहोल्डर किसी कंपनी का एक हिस्सा होता है, जबकि डिबेंचर होल्डर कम्पनी का हिस्सा नहीं होता. डिबेंचर से यह भी पता लगता है कि कंपनी किसी ऋण में नहीं है.
  • रिटर्न- किसी शेयर का डिविडेंड कंपनी के तात्कालिक लाभ पर निर्भर करता है, किन्तु डिबेंचर में निवेशक को इस बात से अलग ब्याज प्राप्त होता है कि कंपनी लाभ में है या घाटे में.
  • रीपेमेंट- रेडीमेबल प्रेफेरंस शेयर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के प्राप्त नहीं हो सकते, किन्तु डिबेंचर की राशि एक निश्चित किये समय के पूरे हो जाने पर अपने एक्सपायरी डेट के समय डिबेंचर होल्डर को सौंप दी जाती है.
  • आय का प्रारूप- शेयर में किसी शेयरहोल्डर को लाभ के तौर पर डिविडेंड प्राप्त होता है, जबकि डिबेंचर में निवेशक को ब्याज प्राप्त होता है.
  • सुरक्षा- शेयर होल्डर का कंपनी के एसेट पर किसी तरह का चार्ज नहीं होता है, जबकि डिबेंचर होल्डर का किसी कंपनी के सभी एसेट अथवा किसी निश्चित एसेट पर चार्ज होता है. शेयर के लिए किसी भी तरह के सिक्यूरिटी चार्ज जारी नहीं किये जाते हैं, किन्तु डिबेंचर के लिए सिक्यूरिटी चार्ज ज़ारी किये जाते हैं.

निवेश के लिए महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंटस

पैन कार्ड

Share Market Se Paise Kaise Kamaye आपको पता होना चाहिए कि स्टॉक मार्केट में निवेश के लिए सबसे पहले किसी भी इच्छुक व्यक्ति के पास पैन कार्ड होना अनिवार्य है। इसका फुल फॉर्म होता है परमानेंट एकाउंट नंबर। यह दस अंकों का एक महत्वपूर्ण नंबर होता है जिसे भारतीय आयकर विभाग द्वारा जारी किया जाता है। दरअसल, भारत में किसी भी वित्तीय लेनदेन के लिए यही पैन नंबर आवश्यक होता है। यदि आपका पैन कार्ड नहीं बना है तो अविलम्ब इसे बनवा लीजिए। अब इसे बनवाने के लिए ऑनलाइन एप्लीकेशन भी एनएसडीएल की वेबसाइट पर भेज सकते हैं।

केवाईसी (KYC) डॉक्यूमेंट

आपने देखा होगा कि बैंक भी अपने विभिन्न खातों के लिए एक निश्चित अंतराल पर केवाईसी करती है। इसका फुल फार्म होता है नो योर कस्टमर। इसके अंतर्गत किसी भी खाताधारक से उसके आधार कार्ड एवं अन्य एड्रेस प्रूफ के अपडेट्स मांगे जाते हैं जो केवाईसी डाक्यूमेंट्स कहलाते हैं।

इंटरनेट बैंकिंग

स्टॉक मार्केट से आप जो भी स्टॉक (शेयर) खरीदेंगे, उसका भुगतान करने के लिए आपको अपने ब्रोकर को पेमेंट देना होगा, क्योंकि आपका ब्रोकर ही आपके पैसे को शेयर बेचने वाले तक पहुंचाएगा और आपने जो भी शेयर ख़रीदा है, वह शेयर आपके डीमैट एकाउंट में जमा कर देगा। यही वजह है कि आपको अपने ब्रोकर को भुगतान करने के लिए अनिवार्य रूप से एक ऑनलाइन इन्टरनेट बैंकिंग अकाउंट की जरूरत पड़ती है, जिसके माध्यम से आप अपने ब्रोकर को भुगतान (पेमेंट) दे सकें। लिहाजा, आपके सभी तरह के भुगतान का रिकॉर्ड रखने के लिए प्रत्येक स्टॉक ब्रोकर एक एकाउंट खोलता है, जिसे ट्रेडिंग एकाउंट कहते हैं। दरअसल, आपको कोई भी स्टॉक खरीदने के लिए सर्वप्रथम अपने इसी ट्रेडिंग एकाउंट में पैसे जमा करने होंगे, एवं शेयर बेचने पर आपका ब्रोकर इसी ट्रेडिंग एकाउंट में आपको शेयर के बदले पैसा जमा कर देंगा। इसी तरह आपकी शेयर्स की खरीद-बिक्री चलती रहेगी।

स्टॉक ब्रोकर का चयन

कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्षतः स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई या एनएसई) से स्टॉक खरीद या बेच नहीं सकता है। इसलिए स्टॉक एक्सचेंज तक हमारे स्टॉक खरीदने या बेचने के आर्डर को किसी स्टॉक ब्रोकर द्वारा ही पूरा किया जाता है। तभी तो शेयर खरीदने के लिए या स्टॉक मार्केट में निवेश के लिए किसी को भी एक स्टॉक ब्रोकर की जरूरत होती है, जो एक ऐसी एजेंसी होती है जो स्टॉक एक्सचेंज पर स्टॉक खरीदने या बेचने के लिए प्राधिकृत होती है।

डीमैट एकाउंट

किसी भी व्यक्ति द्वारा ख़रीदे गए शेयर को अपने पास रखने के लिए हमें अनिवार्य रूप से डीमैट एकाउंट की जरूरत होती है, जिसमें ख़रीदे गए शेयर (स्टॉक) इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में जमा (क्रेडिट) रहते हैं, लेकिन जब इसे बेचा जाता है तो इसे बेचने पर भी इस अकाउंट से डेबिट कर दिए जाते हैं। प्रायः हरेक बार यही सिलसिला चलता रहता है।

ट्रेडिंग एकाउंट

किसी भी शेयर को खरीदने या बेचने का काम ट्रेडिंग एकाउंट की मदद से ही किया जाता है जिसमें हमें एक यूजर आईडी और पासवर्ड मिलता है। प्रायः इसकी मदद से ही हम लोग स्टॉक ब्रोकर के सॉफ्टवेयर या सिस्टम का उपयोग करके कोई भी स्टॉक खरीदने अथवा बेचने का आर्डर देते हैं।

शेयरों के भाव में उतार-चढ़ाव

किसी कंपनी के कामकाज, ऑर्डर मिलने या छिन जाने, नतीजे बेहतर रहने, मुनाफा बढ़ने/घटने जैसी जानकारियों के आधार पर उस कंपनी का मूल्यांकन होता है. चूंकि लिस्टेड कंपनी रोज कारोबार करती रहती है और उसकी स्थितियों में रोज कुछ न कुछ बदलाव होता है, इस मूल्यांकन के आधार पर मांग घटने-बढ़ने से उसके शेयरों की कीमतों में उतार-चढाव आता रहता है. अगर कोई कंपनी लिस्टिंग समझौते से जुड़ी शर्त का पालन नहीं करती, तो उसे सेबी BSE/NSE से डीलिस्ट कर देती है. शायद आपको पता न हो, विश्व के सबसे अमीर व्यक्तियों में शामिल वारेन बफे भी शेयर बाजार (Stock Market) में ही निवेश कर अरबपति बने हैं। Share Market Se Paise Kamaye


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